بلال
ُ يرسل صوت الآذان
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عبث
هيمان |
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وهماً
ترتاد .. ضياعاً .. يا قلب الاحزان |
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عفواً
مولاتي .. |
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ثارَ
العقلُ
ورقْ
القلبُ |
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فسادت
موجاتُ
الهَذَيَان |
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عذراً
مرفأ
أحلامي |
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فالعمرُ
شتاتٌٌ .. بين فؤادٍ
يبعثُ
حُلماً |
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يغرسُ
وهماً .. ذابل
أيامي |
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ثم
الفكرُ
الثائر |
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ثم
الحظ
العاثر |
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ثم
إبائي .. ثم بكائي .. يُنهضُ
غائر الآمي |
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قلقي
يُنهِكُني
... يُرهِقُني |
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نيرانُ
الحيرة
.. تحرِقُني |
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وحنيني
.. شوقي .. مولاتي |
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ليقينٍٍ
يُورِثُني
الإيمان |
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أو
نسيٍٍ
يجعلُني
إنسان |
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فشقاءُُ
أن
العق
قيدي |
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وبلالُُ
يُرسِلُ
صوتَ آذان |
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آهٍ
مولاتي
لو
تدرين |
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كيف
سنين
العمر
يباب |
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ثمَّ
يبابُ
العمرِ
سنين |
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كان
زمانُ
العشقِ
ضنين |
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وحنيني
يفنى
محضِّ
حنين |
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مدَّ
طريق
العشقِ
طريق |
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قدري
أن
أمضي
مولاتي |
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بطريقي
وحدي .. دون
رفيق |
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أتوهَّجُ
عِشقاً .. دون
عشيق |
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أتنسَّمُ
ورداً
دون
رحيق |
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أتنكَّبُ
دربي
دون
دليل |
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فإذا
ما الليلُ
يطولُ .. يطولُ |
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حلَّ
بقلبي
عامُ
الفيل |
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تدفق
أمناً
عام
الفيل |
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تفتَّقَ
.. فتحاً .. ونبوة |
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انساب
حناناً ..
وأبوَّة |
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بل
جاء
ليمنحني
الإيمان |
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فهنيئاً
لإيلاف
قريش |
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إبدالاً
بعد
الخوفِ
أمان |
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وإذا
ما دثَّرني
صمتي |
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غارَ
بقلبي
غارُ
حراء |
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إنبعثَ
رسالاتُ
ونداء |
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كان
زمانَ
الحُبِ صفاء |
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كان
زمانَ
الحب وفاء |
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كان
طريقَ
الحبِ
هناء |
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وإذا
ما أرهقني
صوتي |
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تدفَّق
إحساساً
عُمقي |
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تفجَّر
بركاناً
عِشقي |
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ورقَّ
القلب
فثار
العقلُ
وجار
زمان |
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كلَّ
حنيني
دون
حنان |
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بات
يطاردني
شوقي |
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قلقي
يُنهِكُني
... يُرهِقُني |
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نيرانُ
الحيرة
.. تحرِقُني |
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وحنيني
.. شوقي .. مولاتي |
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ليقينٍٍ
يُورِثُني
الإيمان |
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أو
نسيٍٍ
يجعلُني
إنسان |
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فشقاءُُ
أن
العق
قيدي |
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وبلالُُ
يُرسِلُ
صوتَ آذان |
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عصام
عبدالباسط
الخرطوم 1985م |